Saturday, November 5, 2011

प्रेम लिखना है

प्रेम लिखना है
आओ मेरे होंठ पर एक वर्ण आंक दो

समंदर नहीं लिखना, पहाड़ नहीं लिखना
गांव की वह नदी लिखनी है
जो अब सूखने के कगार पर है

आओ मेरी देह पर बारिश की बूंद की तरह झरो

अन्न नहीं लिखना खेत नहीं लिखना
किसान लिखना है
जिसके घर का चुल्हा चार दिन से उदास
मृत्यु ही जिसके लिए एक आत्मीय आगोश

आओ मेरी त्वाचा पर जीवन की तरह बहो

छन्द नहीं लिखना, गीत नहीं लिखना
दुख लिखना है
जो इस देश की मिट्टी में ठहर गया है कहीं

आओ मेरी स्याही में चुपचाप घुल जाओ पिघल कर

कविता नहीं
एक स्त्री का नाम लिखना है अपने नाम के उपर
और सदियों से खड़े
इतिहास के एक पवित्र किले को ध्वस्त कर देना है

आओ मेरे हृदय में मशाल की तरह जलो

अंत में
एक लंबी चिट्ठी लिखनी है
अपने गांव अपने पितरों के नाम

आओ मेरे खुरदरे-कांपते हाथ गहो

और मेरी शक्ल में तुम
तुम भी लिखो वह
जिसे अब तक लिखा नहीं
किसी इतिहासकार कवि - दार्शनिक या किसी ने भी

वह
जो किसी भी काम से ज्यादा जरूरी

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