Monday, November 7, 2011

जो बीत गई सो बात गई

जो बीत गई सो बात गई
जीवन में एक तारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आंगन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छुट गए फिर कहा मिले
पर बोलो टूटे तारो पर
कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई |

तुम्हारी पलकों का कँपना

तुम्हारी पलकों का कँपना ।
तनिक-सा चमक खुलना, फिर झँपना ।
तुम्हारी पलकों का कँपना ।

मानो दीखा तुम्हें किसी कली के
खिलने का सपना ।
तुम्हारी पलकों का कँपना ।

सपने की एक किरण मुझको दो ना,
है मेरा इष्ट तुम्हारे उस सपने का कण होना,
और सब समय पराया है
बस उतना क्षण अपना ।

तुम्हारी
पलकों का कँपना ।

लोग तो कुछ भी कहते हैं....

सबसे दिल का हाल न कहना, लोग तो कुछ भी कहते हैं
जो कुछ गुजरे खुद पर सहना, लोग तो कुछ भी कहते हैं

हो सकता है इससे दिल का बोझ जरा कम हो जाये
अश्रु-ए-गम बहा भी लेना, लोग तो कुछ भी कहते हैं

इस जीवन की राह कठिन है, पाँव में छाले पड़ते हैं
मगर हमेशा सफ़र में रहना, लोग तो कुछ भी कहते हैं

नए रंग में ढली है दुनिया, प्यार पे लेकिन पहरे हैं
ख्वाब सुहाने बुनते रहना, लोग तो कुछ भी कहते हैं

सोच-समझकर प्यार से हमने तेरी शोख अदाओं को
नाम दिया फूलों का गहना, लोग तो कुछ भी कहते हैं

आँखों में है अक्स तुम्हारा, हमने सबसे कह डाला
तुम भी अपने दिल की कहना, लोग तो कुछ भी कहते हैं ..!!

उधार का यह प्रेम

पर एक बात चाहूँगा मैं
तुमसे पूछना
क्या तुम दोगी उधार में
अपना प्रेम
मैं लौटा दूँगा उसे एक दिन
पूरे ब्याज सहित
बहुत दरकार है मुझे उसकी
फ़िलहाल

मैं ख़ुद को
अपनी आत्मा को
अपनी त्वचा को
गिरवी रखता हूँ
तुम्हारे पास
पाने के लिए
थोड़ा-सा
तुमसे
तुम्हारा उधार का यह प्रेम !
जिसे मैं लौटा दूँगा बिना शर्त
अविलम्ब
एक दिन....।

तुझे भुलाना भी मुश्किल है............!!

मोहब्बत का इरादा अब बदल जाना भी मुश्किल है;
तुझे खोना भी मुश्किल है, तुझे पाना भी मुश्किल है;
जरा सी बात पर आंखें भिगो के बैठ जाते हो;
तुझे अब अपने दिल का हाल बताना भी मुश्किल है;
उदासी तेरे चहरे पे गवारा भी नहीं लेकिन;
तेरी खातिर सितारे तोड़ कर लाना भी मुश्किल है;
यहाँ लोगों ने खुद पे परदे इतने डाल रखे हैं;
किस के दिल में क्या है नज़र आना भी मुश्किल है,
तुझे ज़िन्दगी भर याद रखने की कसम तो नहीं ली;
पर एक पल के लिए तुझे भुलाना भी मुश्किल है............!!

आई लव यू

जब सो जाती है सारी दुनिया
चाँद चुपके से आ कर खड़ा हो जाता है मेरी खिड़की के सामने
कहता है खोज लो मुझमे वो चेहरा जिसकी तलाश में हो तुम
हवाए शाकल खटका कर पूछती है बहुत उदास हो ना
अगली बार लौटुगी तो लेकर आउगी उसका पता
बादल कहते है हम तो यायावर है घूमते है देश-विदेश
कभी चलना हमारे साथ मिलकर ढूँढेगे उसे
फूल,भौरे,चिड़ियाँ सब तुम्हारी ही बाते करते है
मै चुपचाप सुनता हु और सबके चले जाने पर
धीरे से बोलता हु एक शब्द
मै जानता हु तुम जहा हो जहा कही भी हो
जरुर सुन लोगी मेरे ये शब्द...........आई लव यू

                                                                

Saturday, November 5, 2011

अचानक से कभी

अचानक से कभी तू सामने आ और दिल को धड़का दे,

मेरी गमगीन आँखों को ख़ुशी के अश्कों से नहला दे….

मेरे कहने से तू आत्ता है मुलाकात के लिए,

कभी खुद मुझसे मिलने आ के, तू मुझको चौका दे …..

तेरी ऑंखें बयाँ करती है राज कई गहरे,

लबो को खोल और राज को लफ़्ज़ों के लिबास पहना दे …..

तू परेशान जो हो तो मेरे दो जहान बेचैन रहते है,

रूह सकून पाती है जो तू खुल के मुस्कुरा दे…..

कभी जुगनू कभी तारा कभी तू चाँद बन जाता है,

किसी सवेरे तू सूरज की पहली किरण बन के मुझको जगा दे…….

मरे हए लोगों के इस शहर में

मरे हए लोगों के इस शहर में
हर आदमी अपने पुर्नजन्म को लेकर परेशान है

मरे हुए लोग
मरे हुए लोगों में शामिल नहीं हैं
उन्हें अपने मरने से परहेज है
जबकि न जाने कितने पहले वे मर चुके हैं

मरे हुए लोगों के अपने झोले हैं
अपनी टंगारी और
अपनी तगाड़ी

सिर से पाँव तक उनके पास सूचनायें हैं
और वे खुद एक सूचना हैं
हमारे समय में डाकिये की तरह

कील जब कभी चुभती है
उनके चेहरों पर खिंचता है एक तनाव
उसे ढीला करने की वे करते हैं कोशिश
और थोड़ी देर बाद
खचिया भर मड़िया में उतराने लगते हैं

मरे हुए लोग
जीने की आशा लिए
लगातार मरते जा रहे हैं
अपनी सारी बरक्कत के बावजूद
इस पवित्र शहर में !

----------- श्रीप्रकाश शुक्ल

तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा

ओ कल्पव्रक्ष की सोनजुही!
ओ अमलताश की अमलकली!
धरती के आतप से जलते..
मन पर छाई निर्मल बदली..
मैं तुमको मधुसदगन्ध युक्त संसार नहीं दे पाऊँगा|
तुम मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा||

तुम कल्पव्रक्ष का फूल और
मैं धरती का अदना गायक
तुम जीवन के उपभोग योग्य
मैं नहीं स्वयं अपने लायक
तुम नहीं अधूरी गजल शुभे
तुम शाम गान सी पावन हो
हिम शिखरों पर सहसा कौंधी
बिजुरी सी तुम मनभावन हो.
इसलिये व्यर्थ शब्दों वाला व्यापार नहीं दे पाऊँगा|
तुम मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा||

प्रेम लिखना है

प्रेम लिखना है
आओ मेरे होंठ पर एक वर्ण आंक दो

समंदर नहीं लिखना, पहाड़ नहीं लिखना
गांव की वह नदी लिखनी है
जो अब सूखने के कगार पर है

आओ मेरी देह पर बारिश की बूंद की तरह झरो

अन्न नहीं लिखना खेत नहीं लिखना
किसान लिखना है
जिसके घर का चुल्हा चार दिन से उदास
मृत्यु ही जिसके लिए एक आत्मीय आगोश

आओ मेरी त्वाचा पर जीवन की तरह बहो

छन्द नहीं लिखना, गीत नहीं लिखना
दुख लिखना है
जो इस देश की मिट्टी में ठहर गया है कहीं

आओ मेरी स्याही में चुपचाप घुल जाओ पिघल कर

कविता नहीं
एक स्त्री का नाम लिखना है अपने नाम के उपर
और सदियों से खड़े
इतिहास के एक पवित्र किले को ध्वस्त कर देना है

आओ मेरे हृदय में मशाल की तरह जलो

अंत में
एक लंबी चिट्ठी लिखनी है
अपने गांव अपने पितरों के नाम

आओ मेरे खुरदरे-कांपते हाथ गहो

और मेरी शक्ल में तुम
तुम भी लिखो वह
जिसे अब तक लिखा नहीं
किसी इतिहासकार कवि - दार्शनिक या किसी ने भी

वह
जो किसी भी काम से ज्यादा जरूरी

मेरी आखों के सवालात कोई क्या जाने...

मौसम-ए-हिज्र के लम्हात कोई क्या जाने
क्या गुजरती है मेरे साथ कोई क्या जाने
दूरियों में भी मेरे साथ मरासिम है वही
रोज़ होती है मुलाकात कोई क्या जाने
लोग हसती हुई आखों पे यकीन रखते है
मेरे आसू मेरे जज्बात कोई क्या जाने
एक तू है जिसे मालूम है सारी बातें
शब् -ए-हिज्र मेरे हालत कोई क्या जाने
कोई क्या जाने की खामोशिया क्या कहती है
मेरी आखों के सवालात कोई क्या जाने...

कहने को मोहब्बत है

कहने को मोहब्बत है लेकिन, अब ऐसी मोहब्बत क्या करनी,

जो नींद चुरा ले आँखों से,



जो ख्वाब दिखा कर फूलो के, ताबीर में कांटें दे जाये

जो गम की काली रातों से हर आश का जुगनू ले जाये,

जो ख्वाब सजाती आँखों को आंसू ही आंसू दे जाये,

जो मुश्किल करदे जीने को, जो मरने को आसाँ करे

वो दिल जो प्यार का मंदर हो, वो यादों को मेहमान करे,



अब ऐशी मोहब्बत क्या करनी

जो उम्र की नगदी ले जाये और फिर भी झोली खाली हो

वो सूरत दिल का रोग बने जो सूरत देखी भाली हो

जो कैश बना दे इन्सां को , जो राँझा ओर फरहाद करे

अब ऐशी मोहब्बत क्या करनी जो खुशियों को बर्बाद करे



देखो तो मोहब्बत के मारे, हर सक्श यही कहता है

सोचो तो मोहब्बत के अन्दर, एक दर्द हमेशा रहता है



फिर भी जो चीज़ मोहब्बत है कब इन बातों से डरती है

कब इनके बांदे रुकती है, जिस दिल में इसे बसना हो ये चुपके से बस जाती है

एक बार मोहब्बत हो जाये

फिर चाहे जीना मुश्किल हो, या झोली खाली रह जाये

या आँखें आंसू बन जाये, या राँझा ओर फरहाद करे,

फिर इसकी हुकूमत होती है , आबाद करे बर्बाद करे,



एक बार मोहब्बत हो जाये, कब इन बातो से डरती है

कब इनके बांदे रूकती है,



जो चीज़ मोहब्बत है 'राही', जब होनी हो; हो जाती है

हां,मगर ईमान की नीलामियां सस्ते में थीं

लौट आए हाथ खाली,कुछ न था बाजार में
हां,मगर ईमान की नीलामियां सस्ते में थीं

जद्दोजहद की जिन्दगी से कर लिए तौबा हमीं
ठोकरें हर कदम मुझको मिली रस्ते में थी

फितरतों से लोग जब चढ़ने लगे बलंदियां
बेच दी हमने किताबें,जो फटे बस्ते में थीं

रौनक-ए-जन्नत जहां में मिल गयी औलाद को
गांव में मां-बाप की हालत मगर खस्ते में थी

कुंवर प्रीतम

नुमाइश नही की....

सिर्फ इतना कहा प्यार है तुमसे .

जस्बातोन की कोई नुमाइश नही की....

प्यार के बदले प्यार मांगा .

रिश्ते की तो कोइ गुज़रिश नही की ...

चाहो तो भुला देना हमे दिल से .

सदा याद रखने की कोइ सिफरिश तो नही की....

खामोशी से तुफानो को सह लेते है जो .

उन बाद्लो ने इज़हार की बरिश तो नही की ...

तुम्हे ही माना है अपना रेहनुमा.

किसी और चिज़ की नुमाइस तो नही

छोड़ आए हैं

हाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं

कहानी का ये हिस्सा आजतक सब से छुपाया है
कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं

नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में
पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं

अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी
वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं

किसी की आरज़ू के पाँवों में ज़ंजीर डाली थी
किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं

पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से
निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं

जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है
वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं

यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद
हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं

हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है
हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं

हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है
अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं

सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे
दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं

हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं
अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं

गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब
इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं

हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की
किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं

बताये क्या .

वह इश्क जो हमसे रूठ गया है ,
अब उसका हाल बताये क्या .
वह जहर जो दिल में उतर लिया ,
फिर उसके नाज़ उठाये क्या .
फिर आँखे लहू से खली है ,
यह शमन बुझने वाली है .
हम खुद भी के सवाली है ,
इस बात पे हम शर्मायें क्या .
एक आग गम -इ - तन्हाई की ,
जो सारे बदन में फ ल गयी .
जब जिस्म ही सारा जलता हो ,
तो फिर दमन -इ -दिल को बचाए क्या .
जो इसका हमसे रूठ गया है ,
उसका हाल बताये क्या .

मैंने चाह था...

दिल की ख़ामोशी से लेकर,सांसो के ठहर जाने तक........
याद आएगा वो एक शख्स मुझे मर जाने तक.....
उसने मुहब्बत के भी पैमाने बना रखे हैं
मैंने चाहा था जिसे हद से गुजर जाने तक.......